Pages

Wednesday, November 07, 2007

इस मौसम में अंगूर भी नमकीन है....



दोस्तो,

कल यानी ६ नवम्बर को हमारे चहेते कलाकार संजीव कुमार जी की पुण्यतिथि थी. उनके बारे में कुछ लिखने का भी मतलब है कि कमसेकम दो पोस्ट की जरूरत। पर साथियो , मैंने कोशिश की है उनके बारे में लिखने की और वो भी सिर्फ एक ही पोस्ट में।

यूँ तो आप सब उनके बारे में कहीं न कहीं कुछ पढ़ ही चुके होंगे पर आज मेरी नज़र से देखिए उन्हें। जी हाँ मैंने इस पोस्ट में उनकी उन फिल्मों के बारे में चर्चा करने जा रहा हूँ जो मेरे दिल के बेहद करीब रही हैं। यूँ तो मैंने उनकी सारी फिल्म नहीं देखी हैं , फिर भी कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों की चर्चा यहाँ जरूर करूंगा।

9 july 1938 को गुजराती परिवार में जन्मे हरिहर जरीवाला उर्फ़ हरिभाई जरीवाला उर्फ़ हमारे संजीव कुमार ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की थी सन १९६० में आयी फिल्म "सात हिन्दुस्तानी" से।

पर १९७० में आयी फिल्म "खिलौना" ने उन्हें एक स्टार का दर्जा दे दिया। इन दस वर्षों में उन्होने बहुत सारी फिल्म कीं ,जिसमे प्रमुख थी १९६५ में आयी फिल्म "निशान" जिसमें उन्होने पहली बार बतौर हीरो काम किया था और दूसरी फिल्म थी दिलीप कुमार के साथ १९६८ में आयी फिल्म " संघर्ष"।

फिल्म खिलौना मैंने अभी हाल में ही देखी है और मैं समझता हूँ कि संजीव कुमार जी ने इस फिल्म में अपने अभिनय की ऊँचाइयों को छुआ है। एक मानसिक रोगी के किरदार को उन्होने जिस खूबसूरती के साथ निभाया है वो काबिले-तारीफ़ है। फिल्म की हीरोइन मुमताज जी के साथ अंतरंग पलों के समय और उसके बाद के मानसिक अंतर्द्वंद्व को उन्होने बखूबी जिया है।

इसके बाद मैं जिक्र करूंगा एक ऎसी फिल्म का जिसमे उनका अभिनय देख कर मैं सदा उनके प्रति नतमस्तक हो जाता हूँ,फिल्म है १९७२ में आयी "कोशिश"। जिन्होनें भी ये फिल्म देखी है वो मेरी इस बात से इत्तफाक़ जरूर रखते होंगे। जया भादुडी और संजीव कुमार अभिनीत ये फिल्म एक गूंगे बहरे दंपत्ति की कहानी है। अपनी आंखों और चेहरे के भाव से ही उन्होने ऎसी कलाकारी दिखायी जो किसी भी कलाकार के लिए एक टेढी खीर होती है। याद करें इस फिल्म का वो हिस्सा जब जया जी माँ बनती हैं, संजीव साहब हाथ में झुन्झुना लेकर बच्चे के कानो के पास झुलाते हैं,पर बच्चे के चहरे पर कोई भाव परिवर्तन न होता देखकर उनके जो भाव होते है वो कितने मर्मस्पर्शी हैं.... पुनः जब डाक्टर बताता है कि बच्चा ठीक है झुनझुने में ही आवाज़ नहीं है तब उनके चेहरे की ख़ुशी देखिए....

इसके बाद याद आती है मुझे १९७५ में आयी एक फिल्म "आंधी "।यूँ तो कहते हैं कि ये फिल्म हमारी पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी के जीवन से प्रेरित थी पर सच्चाई जो भी हो,शादीशुदा होकर भी लगभग एक विधुर का सा जीवन जीने व पति का जो चरित्र उन्होने निभाया जिस कुशलता से जीवन के कशमकश को दिखाया वो अतुलनीय है।

१९७५ में ही आयी दूसरी फिल्म थी "शोले"। इस फिल्म में पहले एक पुलिस इंसपेक्टर और बाद में अपने परिवार को खोने की पीडा से मर्माहत और बदले भावना से ओतप्रोत गुस्सैल किरदार जो उन्होने निभाया उसके बारे में मैं क्या सभी खूब अच्छी तरह से जानते है।
इसी साल उनकी एक और फिल्म आयी थी " मौसम"। इस फिल्म में यूँ तो शर्मिला टैगोर जी दोहरी भूमिका में थीं ,पर संजीव कुमार जी ने पहले प्रेमी और बाद में पिता की भूमिका की। कथानक के अनुसार दोनों जटिल चरित्रों का क्या खूब निर्वहन किया है। अनुभव करें कि एक पिता अपनी ही बेटी को,जो अब एक वेश्या बन चुकी है, घर लाने के लिए पैसे देकर उसका ग्राहक बन कर आता है और उसे ले जाता है.... कितना मर्मस्पर्शी होगा वो दृश्य.

इन सब कथाओं से गुजरते हुए अगर मैं उनके सेंस ऑफ़ ह्यूमर की चर्चा अगर ना करूं तो सारी बात ही व्यर्थ हो जायेगी। संजीदा किरदारों से अलग उनमे एक जबरदस्त सेंस ऑफ़ ह्यूमर था जो उनके विभिन्न किरदारों में अक्सर देखने को मिल जाता था।
मैंने उनकी ऎसी ही फिल्मो मी से एक फिल्म देखी है १९८२ में आयी फिल्म "अंगूर"। इसे फिल्म न कहकर हँसी का पिटारा कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिन्होंने भी ये फिल्म देखी है उन्हें याद होगा कि फिल्म के प्रथम फ्रेम से ही हँसी के जो पटाखे फूटने शुरू होते हैं,वो अंत में shakespeare के हाथ हिलाने तक जारी रहता है। shakespeare को नहीं देखा ? फिल्म का अंत देखिए... बहुत सारे हँसी के पलों में कुछ छांटना बिल्कुत मुश्किल है,फिर भी याद करें फिल्म की शुरुआत में ट्रेन में अशोक आपनी जासूसी नॉवेल पढ़ रहा है , अचानक टॉयलेट से कुछ आवाज़ आती है। अशोक पूरी तैयारी के साथ जाता है(तैयारी याद करें) जब कोई नहीं मिलता तो टॉयलेट शीट के छेद की और हाथ दिखा कर कहता है.... भाग गया। मूली के पराँठे का sequense याद करें ज़रा.....

इन फिल्मों के बीच मैं खुद की देखी उन दो फिल्मों की बात न करूं जिसमे वे महानायक अमिताभ बच्चन जी के साथ है तो बात अधूरी सी लगेगी।ये दो फिल्में हैं १९७८ में आयी फिल्म "त्रिशूल" और १९८१ में आयी फिल्म "सिलसिला"। त्रिशूल में उन्होने एक ऐसे उद्योगपति की भूमिका में हैं जिसने हारना नहीं सीखा है। पर जब उन्हीं के बेटे (अमिताभ) उन्हें एक एक कर पटखनी देने लगते हैं तो वे तिलमिला जाते है। इसमे भी कथानक है कि संजीव कुमार नहीं जानते कि अमिताभ उनके बेटे हैं।कभी गुस्से से तिलमिलाते तो कभी पिता का प्यार जताते तो कभी अपने ही प्यार से नजर नहीं मिला पाने का द्वंद्व जो उन्होने इस फिल्म में दिखाया है वो तारीफ के काबिल है।
सिलसिला में अपनी ही पत्नी को उसके पुराने प्यार की बांहों में झूलते देखकर परेशान होना , अपने दर्द को सीने में दबाकर हंसते रहने का जो स्वाभाविक अभिनय उन्होने किया है वो लाजवाब है।

तो दोस्तो, यूँ तो संजीव कुमार साहब की बहुत सारी फिल्म हैं, फिर भी उन फिल्मों में से जिसे मैंने देखा है उसे मैंने याद कर एक श्रद्धांजलि देने की कोशिश की है। आशा है आप भी कुछ जुडाव महसूस कर सकेंगे।
अंत में फिल्म "मौसम" का वो गाना मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ जो मुझे बेहद पसंद है। यूँ तो भूपेन्द्र जी पर यूनुस भाई निकाल रहे है पर आज आप मेरे साथ सुने लता जी और भूपेन्द्र जी का गाया गीत जिसे गुलज़ार साहब ने लिखा है.

Dil dhoondhta hai ...

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा लगा संजीव कुमार के बारे में इतना सब जानकर.आभार आपका.

हमारी भी संजीव कुमार को श्रृद्धांजली. सुनहरी यादों को नमन.

Lavanyam - Antarman said...

बहुत बढिया और दीपावली मँगलमय हो उसकी शुभेच्छाएँ भी स्वीकारेँ -- लावण्या

नितिन व्यास said...

संजीव कुमारजी को श्रृद्धांजली। अच्छा लगा इतना कुछ पढ कर।। कोशिश मेरी भी पंसदीदा है