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Wednesday, October 17, 2007

"षष्ठं कात्यायनी च "


या देवी सर्व भूतेषु
दया रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै,नमो नमः ॥

नवरात्र के छठे दिन माँ के छठे स्वरूप की पूजा होती है । माँ का यह स्वरूप "कात्यायनी" कहलाता है अर्थात "षष्ठं कात्यायनी च" ।
माँ का स्वरूप अत्यंत ही दिव्य है.इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है. माँ सिंह पर सवार हैं. माँ के चार हाथ हैं,इनके दो हाथ वर मुद्रा में भक्तों को आशीष देते हैं, एक हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है तथा दूसरे में खड्ग है।
माँ कात्यायनी की उपासना कराने से साधक को बड़ी सरलता से धर्म,अर्थ,काम ,मोक्ष चारों फलों की प्राप्ती हो जाती है.इस लोक में रहकर भी वह अलौकिक तेज से और प्रभाव से युक्त हो जाता है। उसके रोग , शोक, संताप ,भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं।
रोगशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान सकलान्भीष्ठान।
त्वामश्रितानां न विपन्नाराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्र्यातां प्रयन्ति।
देवि! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण मे गए पुरुष दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं।

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2 comments:

Udan Tashtari said...

आभार इसे पढ़वाने और सुनवाने का.

गिरीश बिल्लोरे said...


विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर